शनिवार, 14 जनवरी 2012

सूर्य उपासना से सफलता

सूर्य उपासना से सफलता :-
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नक्षत्र और ग्रह सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करते है | ज्योतिष सूर्य पर आधारित है | सूर्य ही दिन - रत रूपी काल के विभाजक तथा संसार की स्रष्टि और संहार का मूल कारण है | सूर्य देव ही ब्रम्हा विष्णु महेश स्वरूप है , त्रिदेवमय है | सूर्य स्वयं महान ज्योतिषशास्त्री है अत : जातक का ज्योतिष ज्ञान सुर्यबल से देखा जाता है | ज्योतिष ज्ञान चाहने वाले साधक को इस क्षेत्र में सफलता के लिए सूर्य देव को प्रथम गुरु का सम्मान देना चाहिए | अध्ययन की पूर्णता के लिए गुरु दक्षिणा का भी विधान है | सूर्य देव के लिए गुरु दक्षिणा में आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ एवं अर्घ्य अर्पित करना चाहिए | भविष्य पुराण में प्राप्त आदित्य ह्रदय स्त्रोत की प्रसिद्धि प्राचीन समय में इतनी अधिक थी की महर्षि पराशर ने सूर्य की दशा - अंतर दशा में इस स्त्रोत के जाप का निर्देश दिया है | यह स्त्रोत १७० श्लोको में उपनिबद्ध है | इसके पाठ से मनुष्य दुःख दरिद्र तथा कुष्ठ आदि रोगों से मुक्त होकर महासिद्धि प्राप्त करता है | वाल्मीकि रामायण में अगस्त्य मुनि प्रोक्त आदित्य ह्रदय स्त्रोत भविष्य पुराण के आदित्य ह्रदय स्त्रोत से भिन्न व् छोटा है | इसमें कुल ३१ स्त्रोत है | अर्घ्य अर्पित करने के लिए तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरे | उसमे लाल कणेर के पुष्प व् लाल चन्दन का घोल मिलाए | जल सुर्योभिमुख होकर जमीन पर एक धार में गिरे | जलधारा पर ध्यान एकाग्र रखते हुए निम्नलिखित मंत्र का जाप करे - ॐ घ्रनी सूर्याय नम : | जो मनुष्य नियमित रूप से विधि विधान से पूजा करता है वह अश्व मेघ का फल प्राप्त कर लेता है | धन , पुत्र , आरोग्य को पाकर अंत में मुक्ति पाता है | उक्त मंत्र का विधिपूर्वक जप करने से ज्योतिष के क्षेत्र में विशेषत : फलित में अपूर्व सफलता मिलती है तहत अन्य जातक जिनकी कुंडली में सूर्य निर्बल अवस्था में हो उन्हें भी सूर्य की पूजा करनी चाहिए | पित्त विकार , अस्थि कष्ट , कम सुने पड़ना , ह्रदय रोग , सर या मष्तिस्क से सम्बंधित रोग , जिस जातक की निर्णय लेने की प्रक्रिया में विलम्ब हजो और नमक का अधिक सेवन करना , आँखों की ज्योति कमजोर होना , अच्छा कार्य करने में यश प्रशंसा नहीं मिलती हो , पिता से अनबन रहती हो तथा शत्रु अधिक हो आदि विकारो को दूर करने के लिए उक्त मंत्र का जप करना चाहिए - ॐ घुनी : सूर्य आदिव्योम || जातक के पूर्व जन्म के कर्मो की स्थिति , आत्मा का आध्यात्मिक विकास , इस जन्म के सूर्य के शुभ या अशुभ स्थान की स्थिति देखकर ज्ञात हो जाता है | इस जन्म में वह निर्बल सूर्य के कारण सूर्य द्वारा ऊत्पन्न विकारो से ग्रस्त होकर कष्ट उठता है नीच राशिगत तुला का सूर्य , शनि से द्रष्ट सूर्य , शनि - राहू के साथ सूर्य , जन्म का बाल्यावस्था या वृद्धावस्था का सूर्य मित्र राशी में भी पूर्ण लाभ नहीं पहुचाता | तत्कालीन लाभ के लिए जातक माणिक्य रत्न की अंगूठी पहने | सूर्य यन्त्र बनाकर पहनना भी उत्तम है | तांबे या सोने के पत्तर पर इस यन्त्र को खुदवाकर विधि विधान से पूजा करके ७००० मंत्र का जप करे | इससे २१ दिन में यन्त्र अभिमंत्रित हो जायेगा | यन्त्र को लाल कपडे में बांध दे | पूजाघर में सूर्य यन्त्र अभिमंत्रित कर स्थापित भी कर सकते है या गले में पहन ले या दाई बांह में बांध ले | सूर्य मंत्र की एक माला जाप जरुर करे |

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