सोमवार, 18 सितंबर 2017

आदित्य हृदय स्त्रोतम

गवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्यपूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रुनाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।      
पूजन विधि        

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक ताम्बे के कलश में जल भरकर उसमे लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्ग्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा क्क्ष में सूर्य यन्त्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।  इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
                          " ॐ घ्रणी सूर्याय नम: "


आदित्य हृदय स्त्रोतम 
इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदय स्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिये देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है। "भगवन सूर्य अपनी अनंत किरणों से शुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओ और असुरो से नमस्कृत , विवस्वान नाम से प्रसिद्द , प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है।  ये तेज की र्राशी तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है।  ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरो सहित सम्पूर्ण लोको का पालन करते है।  ये ही ब्रम्हा , विष्णु , शिव , स्कन्द , प्रजापति , इंद्रा , कुबेर , काल , यम , चन्द्रमा , वरुण , पितर , वसु , साध्य , अश्विनी कुमार , मरुद्रण , मनु वायु , अग्नि , प्रजा , प्राण , ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है।  इन्ही के नाम आदित्य , सविता ,  सूर्य , खग , पुषा , गभास्तिमान , सुवर्ण सदृश , भानु , हिरण्यरेता , दिवाकर , हरिदश्व , सहस्त्रार्ची , सप्तसप्ति , मरीचिमान , तिमिरोन्मथन , शम्भू , त्वष्टा , मार्तन्डक, अंशुमान , हिरण्यगर्भ , शिशिर , तपन , अहस्कर रवि , अग्निगर्भ , अदितिपुत्र , शंख , शिशिरनाशन , व्योमनाथ , तमोभेदी , ऋग , यजु और सामवेद के पारगामी , घनवृष्टि , अपामित्र , विन्ध्यावी पल्लवगम , आतापी , मंडली , मृत्यु , पिगल , सर्वतापन , कवि  , विश्व , महातेजस्वी , रक्त , सर्वभावोद्द्व , नक्षत्र , गृह और तारो के स्वामी , विश्वभावन , तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है।  आपको नमस्कार है।  'पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है।  ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।  आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है।  आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है।  सहस्त्रो किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है।  आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्द है। आपको नमस्कार है।  उग्र , वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है।  कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है।  आप ब्रम्हा , विष्णु , शिव के भी स्वामी है।  सूर आपकी संज्ञा है , यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है , आप प्रकाश से परिपूर्ण है , सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है , आप रोद्र रूप धारण करने वाले है , आपको नमस्कार है।  आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है , सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है , आपको नमस्कार है।  आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है , आप हरि  और विश्वकर्मा है , तम के नाशक , प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है , आपको नमस्कार है।  रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार , सृष्टि और पालन करते है।  ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है।  ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित हॉकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है।  ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषो को मिलाने वाले फल है।  देवता , यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है।  सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है , उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है।  राघव ! विपत्ति में , कष्ट में , दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है , उसे दुःख नहीं भोगना पडता।  इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो।  इस आदित्य ह्र्दय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है।  महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावन का वध कर सकोगे।  यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे , उसी प्रकार चले गये। अगत्स्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्रीरामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान् सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उनमें उत्साह का नवसंचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर  आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्यहृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया।  इसलिए ,इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।
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सूर्य यंत्र

सूर्य ग्रह प्रतीक यंत्र माना है। तथा सूर्य आत्मा का कारक होता है। करियर की उन्नति के लिए, राजकीय मान-सम्मान की प्राप्ति के लिए सूर्य का कुंडली में अनुकूल होना बेहद जरूरी है। किसी की पत्रिका में सूर्य प्रतिकूल हो तो हर कार्य में असफलता नजर आती है। ऐसी स्थिति में सूर्य यंत्र की प्रतिष्ठा कर धारण करने या पूजन करने से सूर्य का शीघ्र ही सकारात्मक फल प्राप्त होने लगता है।पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार पौष मास के रविवार को अत्यधिक महत्व माना जाता है। सूर्य देवता की शक्ति दोनों "आध्यात्मिक और सांसारिक" अंधेरे को दूर करती है। सूर्य देवता की पूजा अपने घर के मंदिर में की जाती है।  



सूर्य यंत्र के प्रकार :- 

सूर्य यंत्र दो प्रकार के होते हैं। प्रथम नवग्रहों का एक ही यंत्र होता है और दूसरा नवग्रहों का अलग-अलग पूजन यंत्र होता है। दोनों यंत्रों के एक जैसे ही लाभ होते हैं। 


पूजन कैसे करें :- 

सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए सूर्य यंत्र को सम्मुख रखकर विष्णु भगवान का पूजन या हरिवंश पुराण की कथा का आयोजन करना चाहिए। पौष मास के रविवार को बिना नमक का भोजन ग्रहण करना चाहिए। विधान के अनुसार उस दिन सुबह से ही मुंह जूठा ना करें। ठीक बारह बजे जब सूर्य देवता शीर्ष पर हों तब शुद्ध ताजे बने चावल पर दूध डालें। उस पर आधा चम्मच शुद्ध घी डालें, सबसे ऊपर शकर रखें। इस भोग को सूर्य देवता को अर्पित करें। बाद में सूर्य यंत्र की पूजन के पश्चात इसे स्वयं ग्रहण करें। सूर्य यंत्र किसी भी बढ़ती चंद्रमा रविवार को आप अपने पूजा घर में स्थापित कर सकते है। 



सूर्य यंत्र से लाभ :-

इस यंत्र की पूजा से सूर्य ग्रह का शुभ फल प्राप्त होता है तथा अनिष्ट फल की शांति होती है। जिन लोगों की जन्म पत्रिका में सूर्य ग्रह कमजोर स्थिति में हो उनको सूर्य यंत्र की पूजा, उपासना से अवश्य लाभ होता है। इस यंत्र को सामने रखकर नवग्रहों की उपासना करने से सभी प्रकार की आपदाएं नष्ट होती हैं। तथा आरोग्य प्राप्त होता है। व्यापार आदि में सफलता मिलती है। समाज में यश-पद-प्रतिष्ठा-प्रगति प्राप्त होती है। शुभ कार्यों में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती है। सूर्य यंत्र के उपयोग के द्वारा शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जाती है, इस यन्त्र की सहायता से सूर्य के हानिकारक प्रभावों को दूर किया जा सकता है।



पीड़ित सूर्य के उपाय :-

कुंडली में यदि सूर्य ख़राब हो जैसे- नीच का हो या- राहू के साथ हो या- सप्तम में हो या- बाहरवे भाव में हो या- अन्य किसी प्रकार से कमजोर अथवा अशुभ फल दे रहा हो तो हम घर बैठे कैसे इसको शांत कर सकते है, इसके निम्न उपाय है :-
1. सूर्य यदि शनि या राहू के साथ हो तो विधिवत रुद्राभिषेक करवाना चहिये। 
2. प्रतिदिन लाल चन्दन एवं केशर मिलकर सूर्य को जल देने से व गायत्रीमंत्र का जाप करना चाहिए। 
3. प्रश्न मार्ग के अनुसार बाधक स्थान में सूर्य होने से शिव एवं भूत के कोप से रोग होते है अतः     इनकी शान्ति जाप करवाकर करवाने चाहिए। स्त्री राशी में सूर्य होने पर माता भगवती की आराधना   करनी चाहिए व हवन एवं दान प्रत्येक अनुष्ठान के अंग है इनको करना चाहिए। 
4. सूर्य को प्रसन्न करने के लिए सूर्योदय के समय जब आधा सूर्य निकले तो लाल पुष्प गिला करके   सूर्य को नियमित अर्ध्य दे। 
5. आत्म बल बढ़ाना हो या धन प्राप्ति की इच्छा हो तो माणिक्य युक्त सूर्य यंत्र सोने में बनवाकर     धारण करे। 



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